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सुप्रीम कोर्ट ने लिया मोदी से पंगा, सरकारी फैसले पलटते हुए सुनाया ऐसा फैसला, हैरान रह गए लोग

नई दिल्ली : ऐसा लग रहा है कि देश की न्याय व्यवस्था ने बीजेपी के खिलाफ फैसले सुनाने का बीड़ा उठा लिया है. सरकार के सभी फैसलों में कोर्ट एक के बाद एक अड़ंगे लगाए जा रहा है. राम मंदिर को लेकर फैसला सुनाने की जगह तारीख दी जा रही हैं और अवैध तरीके से देश में घुसे रोहिंग्या मुसलामानों का पक्ष ले रही है देश की सर्वोच्च अदालत. अब इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को एक और बड़ा झटका दिया है, जिसे देख कर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे.

 

अवैध बांग्लादेशियों को नहीं निकाल सकती सरकार

देश में करोड़ों अवैध बांग्लादेशी पिछले कई सालों से घुसे हुए हैं. जो देश की जनता के टैक्स के पैसों से मिलने वाली सरकारी सुविधाओं का उपयोग भी कर रहे हैं और देश के खिलाफ आतंकी गतिविधियों में भी शामिल हैं. पिछली सरकारों ने तो वोटबैंक के लिए इन्हे देश के अलग-अलग हिस्सों में सुनियोजित तरीके से बसाया, मगर मोदी सरकार ने इन्हे देश से निकालने का बीड़ा उठाया हुआ है.

असम सरकार के लिए भी बांग्लादेशी घुसपैठियों का मसला लंबे समय से सिरदर्द का सबब बना हुआ है. राज्य सरकार की मुश्किल यह है कि वह अपने असल नागरिकों और घुसपैठियों की पहचान कैसे करें. इसी समस्या के समाधान के लिए कुछ समय पहले असम सरकार ने एक व्यवस्था शुरू की थी, जिसके तहत ग्राम पंचायतों में बनने वाले जन्म प्रमाण पत्र को पहचान के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं माना जा रहा था.

अवैध रोहिंग्या व् बांग्लादेशी मुस्लिमों को सुप्रीम कोर्ट का वेलकम

सरकार का कहना है कि अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिये ग्राम पंचायतों में आसानी से जन्म प्रमाणपत्र बनवा लेते हैं, इसलिए इसे पर्याप्त दस्तावेज नहीं माना जा सकता वरना घुसपैठियों की पहचान कभी हो ही नहीं पाएगी और वो देश में घुसे रहेंगे. मगर जो सुप्रीम कोर्ट अवैध रोहिंग्या मुस्लिमों तक को देश से बाहर निकालना नहीं चाहता, वो भला बांग्लादेशियों को कैसे निकालेगा?

लिहाजा मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इस व्यवस्था को खारिज कर दिया और अब पंचायतों द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र नागरिकता हासिल करने के लिए वैध सहायक दस्तावेज माना जाएगा. यानी अब अवैध बांग्लादेशी, रोहिंग्या मुस्लिम व् अन्य भी जितने घुसपैठिए हैं, वो सभी आराम से पंचायतों में भ्रष्टाचार के जरिये जन्म प्रमाणपत्र बनवा कर भारत की नागरिकता हासिल कर सकते हैं.

घुसपैठियों अब भारत के नागरिक

मजे की बात देखिये कि गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी सरकार की बात को सही मानते हुए पंचायत द्वारा जारी सर्टिफिकेट को अवैध करार दिया था. मगर सुप्रीम कोर्ट के दिल में अवैध घुसपैठियों के प्रति जो ममता है, वो समझ के परे है.

 

इसके अलावा असम सरकार ने नागरिकों को दो तरह की नागरिकता दी थी. करीब एक करोड़ नागरिकों को मूल निवासी नागरिकों का दर्जा दिया था, वहीं अन्य को गैर मूलनिवासी नागरिकों का दर्जा दिया था. असम में गैर मूल निवासी नागरिकों की संख्या 3 करोड़ के करीब है.

मगर सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी इंकार कर दिया और कहा कि मूल निवासियों और गैर मूल निवासियों के बीच कोई अंतर नहीं होगा. कोर्ट ने कहा कि नागरिकता के लिए सिर्फ एक कैटेगिरी होगी – भारत की नागरिकता. मतलब अब आराम से बांग्लादेश से बॉर्डर पार करके आसाम पहुंच जाओ, पंचायतों में सक्रिय भ्रष्टाचारी एजेंटों के जरिये जन्म प्रमाण पत्र बनवा लो और भारत के नागरिक बन जाओ.

पुराने दस्तावेज भी जायज

असम में अब तक 25 मार्च 1971 से पहले के दस्तावेजों को मान्यता नहीं थी. यानी इससे पहले के दस्तावेज धारकों को असम सरकार भारतीय मानने से इनकार करती थी. मगर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस आदेश को भी खारिज कर दिया. अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी नागरिक के पास अपनी नागरिकता साबित करने के सबूत के तौर पर यदि 25 मार्च 1971 से पहले के दस्तावेज हैं तो उसे भारतीय माना जाएगा.

अवैध घुसपैठियों की जितनी मदद देश का सुप्रीम कोर्ट कर रहा है, उतनी तो शायद किसी अन्य ने नहीं की होगी. सवाल ये खड़े हो रहे हैं कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के मन में अवैध घुसपैठियों के लिए इतनी हमदर्दी क्यों है? अभी हाल ही में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सुप्रीम कोर्ट में जारी भ्रष्टाचार को लेकर कोर्ट को लताड़ लगाई थी.

तो क्या जजों को कालेधन की फंडिंग की जा रही है? या फिर वामपंथी एजेंडे के तहत देश को तोड़ने के लिए जज इस तरह से सरकारी आदेशों को खारिज कर रहे हैं. सवाल ये भी उठ रहे हैं कि यदि सारे फैसले कोर्ट को ही लेने हैं तो फिर सरकार बनाने की जरुरत ही क्या है? सुप्रीम कोर्ट के जज ही संसद क्यों नहीं पहुंच जाते?

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